
नमस्ते दोस्तों,
कभी-कभी ऐसा लगता है न, कि ज़िंदगी एक अँधेरे कमरे में ठहर गई है? बाहर भले ही दिन हो, उजाला हो, लेकिन हमारे अंदर एक धुंध छाई रहती है।
हम एक नई सुबह का, एक नए सूरज का इंतज़ार करते रहते हैं। हम सोचते हैं कि कोई आएगा, कोई जादू होगा, और यह अँधेरा छँट जाएगा।
मेरी अपनी अँधेरी सुबह
मैं भी उस इंतज़ार में था। मैंने भी उन अँधेरी सुबहों को जिया है, जब बिस्तर से उठने की भी हिम्मत नहीं होती थी। जब हर सपना टूटा हुआ और हर रास्ता बंद नज़र आता था।
और उसी अनुभव से मैंने एक बात सीखी – नई सुबह का सूरज कहीं बाहर से नहीं उगता। यह हमारे अंदर ही सो रहा होता है, बस हमें उसे जगाना होता है।
‘अँधेरी सुबह’ – एक किताब या एक दोस्त?
मेरी नई किताब, “अँधेरी सुबह”, इसी सोए हुए सूरज को जगाने का एक प्रयास है। यह कोई लेक्चर या उपदेश नहीं, बल्कि एक दोस्त की तरह की गई एक लंबी बातचीत है। यह उस रास्ते का नक्शा है जिस पर चलकर मैं खुद उस अँधेरे से बाहर निकला।
इस किताब में आपको क्या मिलेगा?
* गिरने के बाद उठने की कला।
* नकारात्मक विचारों से दोस्ती करने का रहस्य।
* छोटी-छोटी आदतों से बड़ा बदलाव लाने का विज्ञान।
* और यह समझने का मौका कि आप अकेले नहीं हैं।
यह किताब किसके लिए है?
यह किताब हर उस इंसान के लिए है:
* जो ज़िंदगी में ‘फँसा हुआ’ (stuck) महसूस कर रहा है।
* जिसके पास सपने तो हैं, पर उन्हें पूरा करने का रास्ता नहीं दिख रहा।
* जो अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहता है, पर डर उसे रोक लेता है।
* जो एक अनुशासित, ऊर्जावान और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना चाहता है।
“जीत या हार बाहर नहीं, हमारे नज़र के चश्मे में होती है। यह किताब आपको विजेता का चश्मा पहनना सिखाएगी।”
यह किताब मेरे दिल से निकला एक निमंत्रण है, आपके लिए। एक निमंत्रण, अपनी ज़िंदगी में एक नई सुबह का स्वागत करने का।
तो अगर आप तैयार हैं अपनी ज़िंदगी में उस सोए हुए सूरज को जगाने के लिए, तो इस किताब को पहले पन्ने से आपका हाथ थामने का मौका दें।
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आइए, इस सफ़र की शुरुआत करते हैं।
शुभकामनाएँ!