नमस्ते दोस्तों,
हमारे देश में ‘रिजल्ट का दिन’ किसी त्योहार या मातम से कम नहीं होता। उस एक दिन, मार्कशीट के कुछ अंक यह तय कर देते हैं कि आप ‘होनहार’ हैं या ‘नाकारा’। पड़ोसियों की आँखों में आपके लिए सम्मान होगा या उपहास। मैंने अपने आस-पास कई युवाओं को इस दबाव में टूटते, बिखरते और अपने सपनों को मरते हुए देखा है। मेरे मन में हमेशा एक सवाल उठता था – क्या एक असफलता वाकई इतनी बड़ी होती है कि वह आपकी पूरी ज़िंदगी की कहानी लिख दे?
इसी सवाल का जवाब ढूँढ़ने की एक कोशिश है मेरा उपन्यास – “इंजीनियर साहब”।
यह कहानी सिर्फ एक इंजीनियर की नहीं है। यह उस हर एक लड़के और लड़की की कहानी है जो छोटे शहर की आँखों में बड़े सपने लेकर जीता है, लेकिन किस्मत और हालात उसे बार-बार ज़मीन पर पटक देते हैं।
कहानी का नायक है प्रियंक, बिशुनपुर गाँव का एक होनहार लड़का, जिसके परिवार को उससे बड़ी उम्मीदें हैं। लेकिन उसकी ज़िंदगी में कयामत उस दिन आती है, जब उसकी बड़ी बहन की शादी के जश्न के बीच उसके 12वीं में फेल होने की ख़बर आती है। शहनाइयों के शोर में दबे हुए तानों का ज़हर उसे और उसके परिवार को कैसे तोड़ता है, यह इस कहानी की सिर्फ शुरुआत है।
“इंजीनियर साहब” लिखते हुए मैं सिर्फ प्रियंक के अकादमिक संघर्ष को नहीं दिखाना चाहता था। मैं उस सफर के हर मोड़ को आपके सामने रखना चाहता था, जहाँ ज़िंदगी हमारी सबसे कठिन परीक्षा लेती है:
* समाज का दबाव: जब हर कोई आप पर उंगली उठाए, तब खुद पर यकीन बनाए रखने की लड़ाई।
* अधूरा प्यार: जब आप किसी के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी की “27,000 कप चाय” पीने का सपना देखें, और किस्मत उसे आपसे छीन ले।
* करियर का संघर्ष: कोयले की खान की धूल फाँकने से लेकर अपनी कंपनी ‘बेनियो ग्रुप’ खड़ी करने तक का सफर।
* धोखा और विश्वासघात: जब आप सफलता के शिखर पर हों और एक करीबी दोस्त का धोखा आपको अर्श से फर्श पर पटक दे।
और इन सब के बीच, कहानी की आत्मा है एक पिता का अटूट विश्वास। प्रियंक के पापा, आर.के. साहब, जो ऊपर से कठोर लेकिन अंदर से अपने बेटे के लिए कुछ भी कर गुज़रने वाले ‘असली हीरो’ हैं। यह कहानी पिता-पुत्र के उस अनकहे, मज़बूत रिश्ते को भी एक सलाम है।
मैं आपके साथ अपनी किताब का एक छोटा सा अंश साझा करना चाहता हूँ जो इस कहानी के सार को दर्शाता है:
“सफलता का मतलब सिर्फ़ मंज़िल पर पहुँचना नहीं है। सफलता उस हर एक कदम में है, जो आप गिरने के बाद उठाते हैं… उस हर आँसू में है, जिसे पोंछकर आप दोबारा मुस्कुराते हैं… और उस हर एक सुबह में है, जब आप रात के अँधेरे को चीरकर एक नई शुरुआत करने का फैसला करते हैं। गिरना अंत नहीं है, दोस्तों। गिरना तो सफर का एक हिस्सा है। अंत तब होता है, जब आप उठने से इनकार कर देते हैं।”
यह किताब किसके लिए है?
अगर आप एक छात्र हैं और भविष्य को लेकर चिंतित हैं, अगर आप अपने करियर में संघर्ष कर रहे हैं, अगर आपका दिल कभी टूटा है, या अगर आप बस एक ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जो आपको यह विश्वास दिलाए कि हिम्मत और ईमानदारी से कोई भी जंग जीती जा सकती है – तो यह किताब आपके लिए है।
यह कहानी मेरे दिल के बहुत करीब है, और मुझे उम्मीद है कि यह आपके दिल तक भी पहुँचेगी। प्रियंक के इस सफर का हिस्सा बनें, उसकी गलतियों से सीखें और उसकी जीत में अपनी जीत महसूस करें।
“इंजीनियर साहब” अब अमेज़न पर उपलब्ध है!
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इस कहानी को अपना प्यार दें और अगर यह आपके दिल को छू जाए, तो अपने दोस्तों के साथ भी ज़रूर साझा करें।
आपका,
संजीव कुमार